रेल कर्मचारियों की पांच बड़ी यूनियनों ने एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया है। प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर उन्होंने मांग की है कि रेल बजट में यात्री किराये में हुई वृद्धि को वापस न लिया जाए। नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन रेलवेमेन ने तो यहां तक चेतावनी दी है कि अगर इस बढ़ोतरी को वापस लिया गया तो 14 लाख रेल कर्मचारी ‘बगावत करने को मजबूर’ हो जाएंगे।
ट्रेड यूनियनें कर्मचारियों के वेतन और सुख-सुविधाओं में इजाफे से अलग जाकर कोई मांग उठाएं, ऐसे उदाहरण दुर्लभ ही हैं। स्पष्टत: ये कर्मचारी भारतीय रेलवे की संकटपूर्ण वित्तीय स्थिति से परिचित हैं। वे जानते हैं कि उनका भविष्य तभी सुरक्षित है, जब इस संगठन की सेहत ठीक रहेगी। अब इस्तीफा दे चुके रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी के किराया वृद्धि संबंधी बजट प्रस्तावों पर रेल कर्मचारियों जैसी ही दुर्लभ प्रतिक्रिया आम जन और मीडिया की भी रही है।
आम तौर पर किराये या किसी सेवा शुल्क में बढ़ोतरी पर विरोध भाव ही देखने को मिलता है। लेकिन इस बार यह समझदारी व्यापक रूप से देखने को मिली है कि रेलवे को धन की सख्त जरूरत है, जिसके बिना सुरक्षित और सुविधापूर्ण यात्रा लगातार दूभर होती जाएगी। यह देश में एक नए तरह का घटनाक्रम है, जो सार्वजनिक विमर्श के परिपक्व होने की झलक देता है।
अगर लोग फौरी फायदों से उठकर अपने दीर्घकालिक लाभ को देखने लगे हैं, तो उससे देश के बेहतर भविष्य के प्रति भरोसा निस्संदेह मजबूत होगा। यह सस्ती लोकप्रियता की राजनीति करने वाले दलों एवं नेताओं के लिए एक चेतावनी है। अगर ममता बनर्जी की धारणा यह रही होगी कि दिनेश त्रिवेदी पर गाज गिराकर वे अपनी जनपक्षीय छवि को मजबूत कर लेंगी, तो बेशक उन्हें निराशा हाथ लगी होगी।
ट्रेड यूनियनें कर्मचारियों के वेतन और सुख-सुविधाओं में इजाफे से अलग जाकर कोई मांग उठाएं, ऐसे उदाहरण दुर्लभ ही हैं। स्पष्टत: ये कर्मचारी भारतीय रेलवे की संकटपूर्ण वित्तीय स्थिति से परिचित हैं। वे जानते हैं कि उनका भविष्य तभी सुरक्षित है, जब इस संगठन की सेहत ठीक रहेगी। अब इस्तीफा दे चुके रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी के किराया वृद्धि संबंधी बजट प्रस्तावों पर रेल कर्मचारियों जैसी ही दुर्लभ प्रतिक्रिया आम जन और मीडिया की भी रही है।
आम तौर पर किराये या किसी सेवा शुल्क में बढ़ोतरी पर विरोध भाव ही देखने को मिलता है। लेकिन इस बार यह समझदारी व्यापक रूप से देखने को मिली है कि रेलवे को धन की सख्त जरूरत है, जिसके बिना सुरक्षित और सुविधापूर्ण यात्रा लगातार दूभर होती जाएगी। यह देश में एक नए तरह का घटनाक्रम है, जो सार्वजनिक विमर्श के परिपक्व होने की झलक देता है।
अगर लोग फौरी फायदों से उठकर अपने दीर्घकालिक लाभ को देखने लगे हैं, तो उससे देश के बेहतर भविष्य के प्रति भरोसा निस्संदेह मजबूत होगा। यह सस्ती लोकप्रियता की राजनीति करने वाले दलों एवं नेताओं के लिए एक चेतावनी है। अगर ममता बनर्जी की धारणा यह रही होगी कि दिनेश त्रिवेदी पर गाज गिराकर वे अपनी जनपक्षीय छवि को मजबूत कर लेंगी, तो बेशक उन्हें निराशा हाथ लगी होगी।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें